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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 118

एक सौ सोलहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्रहवाँ सर्ग कमल, कुई तथा नीलकमल से सुशोभित तालाब का वर्णन और उसके सिलसिले में कमल, भौरि, हंस, सारस आदि का वर्णन।

43 verse-groups

  1. Verse 1पहले तेरह श्लोको द्वारा स्योवर का ही मुख्यरूप से वर्णन करने के लिए कड श्रूमिका बोधते हे /…
  2. Verse 2इन्द्रनील के पीठे के सदृश भ्रमरो, सारस, क्रौच आदि पक्षियों ओर ब्राह्मणों द्वारा सेवित उक्…
  3. Verse 3राजन्‌, इस सरोवर को देखिये । यह चारों ओर बिखरे हुए सीकरों से (जलकणो से) दिशाओं के मध्यभाग…
  4. Verse 4देखिये, कहीं पर इसमें लम्बी लहरें तैर रहीं हैं, कहीं पर भँवरे अधिक मस्ती से आपस में लड़ते…
  5. Verse 5मोती - जैसे छोटे-छोटे जलबिन्दुओं से यह लोगों के सन्ताप की निवृत्ति करता है, तटभूमि में सि…
  6. Verse 6मेधां को छिन्न-भिन्न कर देनेवाले वायु से कम्पित कमलं की राशियों से गिरे हुए परागपुंज की आ…
  7. Verse 7अपने बच्चों के लिए घोंसलों मे ले जाये जा रहे कमल- नाल, कमल-कन्दरूपी ग्रासो के भार से थके…
  8. Verse 8इस तालाब की लहरी, सुगन्धि के भार से मानों मन्दगामी तथा पुष्परस के संसर्ग से नम वायुओं द्व…
  9. Verse 9राजन्‌, इस सरोवर का राजा का सा ठाट-बाट है । देखिये न, वायुवश हिल रहे महाकमल और पल्लवरूपी…
  10. Verse 10भँवररूपी श्रेष्ठ सत्पात्र मनोहर गुणियों का इसमें मनोज्ञ गाना होता है, इसका जल कमलपरागों क…
  11. Verse 11पवित्र हृदय के समान निर्मल कमलों से भरा हुआ हृदय को अत्यन्त आनन्द देनेवाला जलपूर्णं यह मध…
  12. Verse 12हे सौम्य, जैसे ब्रह्माकार वृत्ति से (चरम साक्षात्कारवृत्ति से) महात्माओं का निर्मल मन शोभ…
  13. Verse 13हेमन्त ऋतु में इस सरोवर की केसी दशा होती ह 2 इस प्रश्न पर कहते हैं / हेमन्त ऋतु में सुन्द…
  14. Verse 14हे राजन्‌, जैसे विकारादिशून्य यह जगत्‌ कूटस्थ नहीं है, किन्तु ब्रह्मात्र ही है, तथापि ब्र…
  15. Verse 15जैसे अपने ही जल से बहाये जा रहे तथा चक्राकार भँवर बनानेवाले जलाशयो के कल्लोलों की परम्परा…
  16. Verse 16जेते कुजे बावड़ी, तालाब और सागरर आदिरुप उपाधि के भेद से जल में तारतस्य की त्कर्ष-अपकर्ष क…
  17. Verse 17जल में उत्पन्न होनेवाले कमल, सेवाल आदि के संसर्ग से जीर्ण हुए इस सरोवर के विविध योनियों क…
  18. Verse 18यहाँ से प्रो का वर्णन आरम्भ करते हैं । अहा ! यह आश्चर्य की बात है कि जिस कमल की लोक में स…
  19. Verse 19जो कमल के गुणशब्द से पुकारे जानेवाले तन्तु हैं उनके तुल्य दोक-युक्त गुणो की सर्वत्र उपेक्…
  20. Verse 20सुगन्धि, सुन्दरता आदि से शोभित होनेवाले बड़े-बड़े उत्कृष्ट कमलों के (यशरूपी सुगन्धि से अप…
  21. Verse 21भगवान्‌ श्रीहरि के वक्षःस्थल में निवास करनेवाली सकल सौन्दर्यों की अधिदेवी लक्ष्मीदेवी जिस…
  22. Verse 22कमल ओर नीलकमल की केवल सफेद और काले रूपों से ही परस्पर विलक्षणता है, किन्तु इनकी जल से जड़…
  23. Verse 23तालाबों मे खिले हुए कमलों की नवोदित शोभा की फूले हुए पारिजात वन से तुलना नहीं की जा सकती,…
  24. Verse 24यदि उसकी बराबरी हो सकती है, तो नाच रही बहू के चाँद के टुकड़े जैसे मन्द मुस्कान युक्त मुखश…
  25. Verse 25फूल ओर लताओं को छोडकर अन्यत्र कभी भूलकर भी मन न लगानेवाले जिन भँवरों की लम्बी आयु फूल और…
  26. Verse 26यद्रो के मकरन्द को चखनेवाले श्रमर पद्म से अतिरिक्त वनों में आसक्त श्रमो का मानों परिहास क…
  27. Verse 27जो भ्रमर शरदादि ऋतुओं में चन्द्रमा के कोटर के तुल्य कोमल (सुन्दरतम) कमलों के अन्दर रहा, ख…
  28. Verse 28मालती की कहीं से भी तनिक भी न फूली हुई शूलसदृश कठोर कली के ऊपर बैठा हुआ भ्रमर कालरुद्र द्…
  29. Verse 29अरे भ्रमर, तुम भाँति-भाँति के फलों के रस चखते हुए सब पर्वतों के निकुंजों मे नित्य चक्कर ल…
  30. Verse 30कमलवनों में मकरन्द चखने में प्रवीण हे भ्रमर, तुम कमलों से भरे सरोवर में जाओ मकरन्द से परि…
  31. Verse 31जैसे पण्डित पुरुष अपने अनुरूप प्रभु, समाज आदि न मिलने पर विद्वान प्रभु की प्राप्ति के लिए…
  32. Verse 32कोई पार्श्वचर हँस्श्रेणी का वर्णन करता हुआ उसे राजा को दिखलाता है / राजन्‌, देखिये, सरोवर…
  33. Verse 33राजन्‌ देखिये, आकाश में हंसी का पीछा कर रहा हंस इस सरोवर के मध्य में प्रतिबिम्बित, ्ूले क…
  34. Verse 34हँस की-सी स््रीव्यस्ननिता की (सत्रीलग्पटता की) कड अनुचर निन्दा करता हैं / हे राजन्‌, अत्य…
  35. Verse 35राजन्‌, राजहंस ने अनायास जो मनमोहक मधुर कूजन (ध्वनि) किया, उसे बगुला पुरे सौ वर्षो मे भी…
  36. Verse 36राजहंस और हंस का जन्मस्थान, आकृति, जाति, चेष्टा, आहार, नाम और रंग सब कुछ समान है । फिर भी…
  37. Verse 37सफेद डैनों से आकाश में स्थित तथा कुमुदाकर की शोभा वढानेवाला हंस उदित हुए चन्द्रमा के समान…
  38. Verse 38ऊपर को उठे हुए नालदण्डवाली नलिनियों के नालरूपी कदलीस्तम्भं से भरे हुए कमलवन में विहार कर…
  39. Verses 39–41यह सरसी (तालाब) जैसे नारी नूपुरों से विराजमान होती है वैसे ही हंस के बच्चों से सुशोभित हो…
  40. Verse 42हे हंस, जलकाक, बगुला, कौआ आदि हिंसको से भरे तालाब में सदा अकेले मत रहो, क्योकि इस आपत्ति…
  41. Verse 43अपने पैरों से गजराज के मस्तकपर आक्रमण करनेवाले एकमात्र पद्माकर में रहनेवाले तथा रक्तकमल,…
  42. Verse 44हे राजन्‌, मैंने हंस (८) चंद्रमा भी शुक्लपक्ष में आकाश में स्थित होता है व कुमुदाकर को खि…
  43. Verse 45हे राजन्‌, इस सरोवर में, आकाश में चन्द्रमा की तरह प्रसन्न (स्वच्छ) जल में चुपचाप चिरकाल त…