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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

बकमद्गुशरारूणां नित्यमेकौकसामपि । संकरोऽस्ति मिथो बुद्धेर्न मूर्खविदुषामिव ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

भँवररूपी श्रेष्ठ सत्पात्र मनोहर गुणियों का इसमें मनोज्ञ गाना होता है, इसका जल कमलपरागों के सम्पर्क से व्याप्त अतएव सुनहला है ओर इसने तटवर्ती उपवन की मस्तकअलंकारभूत पुष्पराशि को फेनपिण्डों के समान सफेद कमलराशि से सुशोभित कर रक्खा है