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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

उत्कन्धरो विततनिर्मलचारुपक्षो हंसोऽयमत्र नभसीति जनैः प्रतीतः । गृह्णाति पल्वलजलाच्छफरीं यदासौ ज्ञातस्तदा खलु बकोऽयमितीह लोकैः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

मोती - जैसे छोटे-छोटे जलबिन्दुओं से यह लोगों के सन्ताप की निवृत्ति करता है, तटभूमि में सिंह की प्रतिबिम्बरूप अन्य सिंह की आशंका से जल पीने में होनेवाली झिझक को वृक्ष की चोटी से लेकर जल तक लटकी लताओं द्वारा प्रतिबिम्ब के दर्शन में रुकावट डालकर भलीभाँति निवृत्त करता है, तरंगों ने इसके आसपास के पत्थरों और कीचड़ से भरे दलदलों को साफ-सुथरा बना दिया है एवं यह असंख्य बादलों से अनन्त कच्छवाला (जलप्राय देशवाला) आकाश ही मानों भूतल में उतरा है