Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मेघाननुसरन्त्येते मयूरास्तनपा इव ।
मलिनो मलिनस्यैव पुत्र इत्यनुमीयते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जल में उत्पन्न होनेवाले कमल, सेवाल
आदि के संसर्ग से जीर्ण हुए इस सरोवर के विविध योनियों के सम्बन्ध से जीर्ण हुए जीव के मन की
तरह कमल आदि की (तत्-तत् देहो की) जर्जर दशापर्यन्त लहरियों के (भोगोत्साहों के) भ्रम से
अत्यन्त व्याप्त हुए आवर्तों के सदृश इच्छा, द्वेष आदि वृत्तियों के परिवर्तनों की भाँति अनगिनत
कमलों के गिनने में कौन समर्थ है अर्थात् कोई भी नहीं