Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 44
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, मैंने हंस
(८) चंद्रमा भी शुक्लपक्ष में आकाश में स्थित होता है व कुमुदाकर को खिलाता है, यों दोनों का साम्य है ।
के पंखों से चीरे गये कमलवन में प्रविष्ट होकर देदीप्यमान कमल के अन्दर बैठे हुए हंस के बच्चे की
अपने पिता के प्रति निकल रही जो जोर की चीत्कार थी, उसका स्मरण किया । उसका वह वचन
था, हे तात ! कमलिनी जैसे सफेद मोती के तुल्य जलबिन्दुओं की वृष्टि करती है वैसे ही आकाश
जल विन्दुओं की राशि वरसाता है,ऊपर सिरपर दोपहर के समय मेँ भी खूब जवानी को पहुँचे हुए
बर्फ को प्रत्यक्ष देखिये