Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
एवं विहन्यते लोकः स्वार्थेनेति प्रदर्शयन् ।
मद्गुर्मद्गुरुतां यात इत्येवं स्तौति दुर्जनः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
देखिये, कहीं पर इसमें लम्बी लहरें तैर रहीं हैं, कहीं पर भँवरे अधिक मस्ती से आपस
में लड़ते हुए गुनगुना रहे हैं, कहीं पर यह गहरे और स्वच्छ जल से-निश्चलतावश- सोया हुआ सा
है एवं कहीं पर कमलों ओर कुमुदों से सोखा हुआ-सा आच्छन्न है