Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
सहचरसहचर्यः क्रमेणोचुः ।
निर्गुणस्य बकस्यास्य गुण एकोऽस्ति दृश्यताम् ।
यत्प्रावृषं स्मारयति प्रावृट् प्रावृडिति ब्रुवन् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले तेरह श्लोको द्वारा स्योवर का ही मुख्यरूप से वर्णन करने के लिए कड श्रूमिका
बोधते हे /
साथियों ने कहा : हे राजन्, यहाँ सामने पर्वतशिखर पर, जो सरोवर की शोभा बढाने के
कारण कामोदीपक होने से काम का प्रधान सेवक-सा (दाहिना-हाथ सा) हे, लाल कमल, श्वेत
कमल ओर नीले कमलो के समूहों की डंडियों में मृणाल के लिए विचर रहे भाँति-भाँति के कलरव
करनेवाले पक्षियों से व्याप्त, अतएव नक्षत्र (तारे) और पक्षियों के साथ प्रतिबिम्बित हुए आकाश
के तुल्य सरोवर को देखिये
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सोलहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्रहवाँ सर्ग कमल, कुई तथा नीलकमल से सुशोभित तालाब का वर्णन और उसके सिलसिले में कमल, भौरि, हंस, सारस आदि का वर्णन।