Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 43
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अपने पैरों से गजराज
के मस्तकपर आक्रमण करनेवाले एकमात्र पद्माकर में रहनेवाले तथा रक्तकमल, नीलकमल, कुन्द
और चम्पकलताओं के भोगरूप सौभाग्य से युक्त यह भँवर भी भाग्यवश हेमन्त ओर शिशिर ऋतु
में ढेले और पत्थर चाटता हुआ स्थल में रहनेवाले बगुले के तुल्य आचरण करता है । अहा ! विपत्ति
के समय महान् पुरुष भी दीनता में मन लगाते है, दीन -हीन बन जाते हैं