Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मृगानालोक्य पथिकश्चिन्तयन्दयितेक्षणे ।
पुरःस्थेषु पदार्थेषु यन्त्रपुत्रिकतां गतः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ से प्रो का वर्णन आरम्भ करते हैं ।
अहा ! यह आश्चर्य की बात है कि जिस कमल की लोक में सौन्दर्य, सुगन्धि आदि सद्गुणो की
खान के रूप से प्रसिद्धि है, वह भी मुकुलितावस्था में जो सुगन्धि, सौन्दर्य, माधुर्य आदि गुणों को
दोषों की तरह गले में निगलकर अन्दर छिपाता है और कुरुप काँटों को बाहर सबको दिखलाता है,
यह जल की (जड़-मूर्ख की) संगति की बलिहारी है । यदि मूर्ख की संगति न होती तो ऐसा क्यों
करता ? (यहाँ से लेकर प्रायः सभी श्लोक अन्योक्तिमय हैं)