Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्फटिकविमलं पीत्वा तोयं घनोदरनिर्गतं पिबति न पुनर्मार्गे क्षुभ्यंस्तृषापि शिखी जलम् ।
स्फुरति च घनं स्मृत्वा स्मृत्वा न चापि विपद्यते गुणवति जने बद्धाशानां श्रमोऽपि सुखावहः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्रो के मकरन्द को चखनेवाले श्रमर पद्म से अतिरिक्त वनों में आसक्त श्रमो का मानों
परिहास करते हैं; ऐसा कहते हैं /
जो भ्रमर कमलमधुमद से उत्पन्न आनन्द से मस्त होकर कमलों पर गूँजते हैं, वे मानों अन्य फूलों
के आस्वादों से सन्तुष्ट भँवरों का परिहास करते हैं ॥