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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

शिखी वार्यपि नादत्ते भूमेर्भुङ्क्ते बलादहिम् । दौरात्म्यं तन्न जाने किं सर्पस्य शिखिनोऽथवा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो कमल के गुणशब्द से पुकारे जानेवाले तन्तु हैं उनके तुल्य दोक-युक्त गुणो की सर्वत्र उपेक्षा ही करनी चाहिये, यों प्रसंगवश कहते हैं । जो गुण कमल के गुणों के (तन्तुओं के) तुल्य छेदवाले (सदोष), कच्चे, ऐसे सूक्ष्म कि मालूम भी न पड़े, छिपाये हुए, जड़तापूर्ण, थोड़े और निस्सार (तुच्छ) हों उनकी सर्वथा उपेक्षा करना ही ठीक है । वे कदापि उपादेय नहीं हैं