Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
आसन्नमद्गुबकगृध्रबिडालसर्पदृष्ट्या भयं भवति यत्सलिलाशयानाम् ।
तस्याग्रतस्तृणमिवाशनिपातभङ्गो जातिस्मरेण विदुषोक्तमदः पुरा मे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, जैसे विकारादिशून्य यह जगत् कूटस्थ नहीं है,
किन्तु ब्रह्मात्र ही है, तथापि ब्रह्म में पृथक्ु-सा प्रतीत होता है । वैसे ही जल में तरंग आदि
जलमात्र ही हैं फिर भी पृथक् से मालूम होते हैं