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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

सा नूनं मम कान्ता दृष्ट्वा सुस्निग्धघनतमःश्यामम् । गगन च शून्यगहनं प्रलपति भुवि पतति विस्खलति ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे पण्डित पुरुष अपने अनुरूप प्रभु, समाज आदि न मिलने पर विद्वान प्रभु की प्राप्ति के लिए अयोग्य (मूर्ख) प्रभु के समीप भी बस जाता है, किन्तु किरातों के बीच में वास नहीं करता वैसे ही हे भ्रमर, जिन ऋतुओं में हेमन्त, शिशिर आदि में - तुम्हें कमल नहीं मिलते उन ऋतुओं में भी अपने रंग से मिलते जुलते अलसी के फूलों में, नीलकमल समूह में तथा फूले हुए तमाल में यथाअवसर प्राप्त हुए मधु से अपनी गुजर करो, जीवन निर्वाह करो