Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 118, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
येनाब्देन शरद्विधावपि शिखी संतर्पितो वारिभिर्नो वर्षास्वपि पूरयेद्यदि सरस्तद्वाललोकोचितम् ।
आरब्धं समवेक्ष्य सज्जनजनो हासेन दुःस्थो भवेद्बर्हीत्यात्मतृषैव नेतुमखिलं कालं समभ्युद्यतः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
फूल ओर लताओं को छोडकर अन्यत्र कभी भूलकर भी मन न लगानेवाले जिन भँवरों की
लम्बी आयु फूल और लताओं का ही आस्वाद लेने में बीती, सचमुच वे ही सौभाग्यशालियों में श्रेष्ठ
हैं (या भग उत्तमा” दो पथक् पद भी हो सकते हैं / केकी स्थिति मे हे दुग, वे श्रग ही उत्तम हैं;
ऐसा अर्थ हैं /2 जो भ्रमर ओर कोयल आम की सुगन्धि, मकरन्द ओर पल्लवो का कषाय रस चखते
हैं, उन्हीका जीवन चमत्कारपूर्णं है, ओरो का तो केवल आयु बिताना है या योनि भोगमात्र है