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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 104

84 verse-groups

  1. Verses 1–8पिशाच देखना आदि जीव का धर्म है, तो फिर वह जीव सर्वदा पिशाच क्यों नहीं देखता ? बन्धु के मृ…
  2. Verse 9बन्धुमरण ज्ञान विशिष्ट जीव है तथा पिशाचदर्शन उसका धर्म है, यदि ऐसा नियम हो, तो भी बन्धु क…
  3. Verse 10इसीलिए चिति के भेद और विनाश का योग होने से चिन्मात्र सर्वात्मक सिद्ध है, वस्तुकृत परिच्छे…
  4. Verse 11इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में सत्यसंकल्प होने के कारण जिसके मार्ग में कोई बिघ्नबाधा (रूका…
  5. Verse 12सत्यसंकल्प ब्रह्मरूपी (=) भाव यह कि पूर्वकाल की चिति से उत्तरकाल की चिति का भेद किंमूलक ह…
  6. Verse 13यदि काढी प्रश्न करे कि कृपया आप ही बतलाइये आपका केसा सिद्धान्त है, तो इस पर कहते हैं। द्व…
  7. Verse 14यदि केवल चिदाकाश ही प्रतीत होता है, तो सब लोगों को द्वश्य” रुपये किसका बोध होता है ? इस प…
  8. Verse 15चिदाकाश अपनी चमत्कार चातुरी को ही आसक्तिवश जाग्रत और स्वप्नबोध में “दृश्य” समझता है ओर सु…
  9. Verse 16वे बोध ओर अबोध कोन हैं ? इस आशंका पर कहते हैं । बोध और अबोध चिदाकाश का ही निरामय (निर्विक…
  10. Verse 17अथवा यह समिय कि आत्मतत्व के अविचार से ही चिक्‌ में दृश्यता थी और इस समय विकार करने पर वह…
  11. Verse 18इस्रलिए विचार के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए यह बात मैं अनेक बार कह बुका हूँ. ऐसा कहते हैं…
  12. Verse 19यदि कड शक्रा करे कि नित्य अपरोक्ष वस्तु के विषय में प्रवृत्त उपदेश-क्चन एक बार की अवृत्ति…
  13. Verse 20तो किस ग्रन्थ को लेकर विचार का अभ्यास करना वाहये जिससे जल्दी से जल्दी बोध चिद्धि को प्राप…
  14. Verse 21उत पर भी बहुत से ग्रहपाठियों के साथ मिलकर अभ्यास करना आपस में एक दूसरे के अनुभव के आदान-प…
  15. Verse 22ज्ञान दुर्लभ हैं, इस भय से श्रवण का त्याय कदापि नहीं करना चाहिये, यह कहते हैं / जो जिस वस…
  16. Verse 23अनात्मथासपरो' के अभ्यास से विमुख हुए पुरुषों को इस शास्त्र का अभ्यास करना चाहिये, यह कहते…
  17. Verse 24यह मनरूपी नदी विवेक और अविवेक दोनों ओर बहती है जिस ओर प्रयत्न से (विरोधी दूसरे स्रोत को र…
  18. Verse 25इस शास्त्र के सिवा विवेक का सर्वश्रेष्ठसाधन आज तक न तो कोई हुआ और न आगे होगा, इसलिए परम ब…
  19. Verse 26जो पुरुष इस श्रेष्ठतम शास्त्र का विचार कर चुका है, उसे प्रत्यक्षरूप से आत्मतत्त्व बोध का…
  20. Verse 27यह शास्र माता, पिता आदि की भी अपेक्षा अत्यन्त हितकारी है, ऐसा कहते है / आपका जो हित पिता…
  21. Verse 28हे सज्जनशिरोमणे, यह भवबन्धनरूपी विषय-विषूचिका असीम है, आत्मज्ञान के अतिरिक्त अन्य उपाय से…
  22. Verses 29–30“अहम्‌' यों मिथ्या ही खड़ी हुई महामोहमयी माया का और उक्त माया से प्राप्त हुई अपरिमित शोचन…
  23. Verse 31आरम्भ में आपाततः मधुर प्रतीत होनेवाले शून्यस्वरूप विषयों का आस्वाद ले रहे आप लोग एकमात्र…
  24. Verse 32कुछ ही दिनों तक जब तक कि आयु की मरणरूप अवधि नहीं आती है, संसार सागर मेँ निमग्न हुए आप लोग…
  25. Verse 33यदि कोर्ड प्रश्न करे कि उसके बाद क्या होगा 2 तो इस पर कहते हैं / दिन पर दिन समीप में आ रह…
  26. Verse 34मूर्ख लोग युद्ध आदि में प्राणों की बाजी लगाकर भी धन और विजयाभिमान का उपार्जन करते हैं, कि…
  27. Verse 35जो विवेकशील पुरुष अनायास (एकमात्र आत्मतत्त्वज्ञान से) ब्रह्माकाश में स्थान बनाते हैं, अज्…
  28. Verse 36हे पुरुषों, आप लोग अभिमान तथा मोह से रहित विवेक को प्राप्त होकर यानी तत्त्व जानकर मोक्षगत…
  29. Verse 37यह वरिष्ठ विर्काल से हम लोगों के उद्बोधन में कमर कसकर लगा हैं, मारे चिल्लाहट के इसका कण्ठ…
  30. Verse 38आज ही आत्मज्ञान से क्या प्रयोजन हे आगे चलकर कभी आत्मज्ञान कर लेंगे यों स्रोचनेवाले के प्र…
  31. Verse 39अपने असली स्वरूप का ज्ञान कराने के लिए इस ग्रन्थ को छोड़कर दूसरा ग्रन्थ नहीं है, इसलिये ज…
  32. Verse 40यदि कोई प्रश्न करे कि अन्य अध्यात्म ग्रन्थों की अपेक्षा इसमें क्या विशेषता हैं, 2 तो इसपर…
  33. Verse 41नित्यप्राप्त भी जिस आत्मरूप ज्ञान को अनेक शास्त्रों से लोग नहीं जान सके, उस दुर्बोध मधुर…
  34. Verses 42–43शास्त्रों में मुख्य आख्यानों में यह सर्वोत्तम है यह अनायास ज्ञान देनेवाला अत्यन्त मनोहर ए…
  35. Verse 44विविध आख्यानों और कथाओं से विस्मयजनक इस शास्त्र का कौतुकवश विचार करता हुआ पुरुष आत्मबोध प…
  36. Verse 45यदि क आशंका करे कि इसी शाख्र से यदि जान होता है, तो इस शाख्र के रचयिता को किर शार से ज्ञा…
  37. Verse 46अतएव इस शास्त्र की अवहेलना करनेवालों के साथ श्रूल कर भी कभी मैत्री नहीं करनी चाहिये, यह क…
  38. Verses 47–49यदि प्रश्न हो कि यदि ऐसा है, तो आप हम लोगों एवं अन्य अज्ञानियों के साथ क्यों मित्रता करते…
  39. Verse 50अथवा मैं आप लोगों का आत्मा ही हूँ आप लोगें के पुण्य से शुद्ध आत्मतत्व का आप लोगों को उपदे…
  40. Verse 51जो पुरुष इसी लोक में नरकरूपी व्याधि के प्रतीकार का उपाय नहीं करता, वह औषधिरहित (जहाँ औषधि…
  41. Verse 52यदि कड आशंका करे कि वैराग्य ही परम सार क्यों है 2 तो इस पर वैराग्य के बिना वासनाओं की तनु…
  42. Verse 53वासना की ननिवृत्ति में आपका इतना बड़ा आग्रह क्यों है ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं । (ष) इ…
  43. Verses 54–55पदार्थों के रहते उनकी कासना की निकृति कैसे हो सकती हैं 2 इस कापर कहते हैं / यदि पदार्थ सत…
  44. Verse 56यद्यपि ये पदार्थ वेदान्तियों के विचार में नहीं हैं तथापि कपिल, कणाद आदि के विचार में तो ह…
  45. Verse 57जगत्‌ के सभी पदार्थ कारण के अत्यन्त अभाव से सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न ही नहीं हुए, ज…
  46. Verse 58कारण का अभाव कैसे हैं ? ऐसा प्रशन होने पर कहते हैं । सभी इन्द्रियों से अज्ञेय स्वप्रकाश च…
  47. Verse 59नाम और रुप युक्त जगरत्‌ का अनाम और अरूप ब्रह्म कारण नहीं हो सकता; यो दूसरी युक्ति दशती है…
  48. Verse 60वट के बीज के समान साकार का साकार ही बीज हो सकता है। बीज वह वस्तु हो उससे साकार विसदृश अन्…
  49. Verses 61–62जिसमें तनिक भी आकृतिवाला कुछ बीज नहीं है, उससे आकृतिवाला विश्व उत्पन्न होता है, यह कथन वि…
  50. Verse 63उस परम पद में कार्यकारण भावादि नहीं है, बकवास के कारण जो उसमें कार्य- कारणभावादि की कल्पन…
  51. Verse 64जयदृज्नानरुप होने के कारण भी चित्‌ जगत्कारण नहीं हो सकता क्योकि घटज्ञान में घटकारणता नहीं…
  52. Verse 65इसीसे परमाणुकारणवादी बोद्ध आदि के मत का खण्डन हो गया / कारण कि अतीन्द्रिय (इन्धियगोवर) पर…
  53. Verses 66–68यदि परमाणु आपस में मिलकर जगत्‌ की रचना करें तो उनका सदा आकाश में उड़ना, गिरना दिखाई देने…
  54. Verse 69यदि कई शका करे कि चेतन को बुद्धिपर्वक किये यये काम में प्रयोजन की अपेक्षा होती है अदुद्धि…
  55. Verse 70इस कथन से वायु ही परमाणु का सधात करेगा, दुद्षिपूर्वक व्यापार के बिना ही अणुर्जे का सधात (…
  56. Verse 71यदि कर्ता के अभाव से जगत्‌ उत्पन्न ही नहीं हुआ तो हम लोगों का क्या स्वरुप है 2 केसे जयत्‌…
  57. Verse 72ङ प्रकार सब कुछ उत्पन्न होने से ब्रह्मअब्वैत प्रिद्धान्त ही निर्बाध है, यह कहते हैं / इसल…
  58. Verse 73जैसे वायु में स्पन्द, जल में द्रवता और आकाश में शून्यता इनसे (वायु आदि से) अभिन्न ही चारो…
  59. Verse 74जयव्‌-शून्य चिदाकाश का जो स्वरुप पहले द्ष्टान्तपूर्वक अनेक बार अनुभव में बैठाया ग्या है,…
  60. Verse 75सब पदार्थों का संविदाकाश ही परमार्थ स्वभाव है, वे सब पदार्थ संविदाकाशमय, चिदाकाशसदुश और च…
  61. Verse 76पूर्वोक्त चिदाकाश की स्वभाव से अभिन्न ही विवर्तभाव से जो परम स्थिति है उसी को आपातदर्शी व…
  62. Verse 77इसलिए (७) जिसकी सुन्दर रचना मन को चक्कर में डाल देनेवाली है, अनेक भुवन, गिरि, नदी, तालाब…
  63. Verse 78क्षणभर में एक देश से दूसरे देश की प्राप्ति में मध्य में ज्ञान का सकल विशेषों से शून्य जो…
  64. Verse 79हे श्रीरामचन्द्रजी, वही अशेष विशेषो से शून्य चिदाकाश सब भूतो का स्वभाव है, उसी में ज्ञानी…
  65. Verse 80यह विश्व चिद्रूपी दर्पण में आभासाकाश ही है, उसका अवभासन भी चित्‌ की प्रभारूप ही है । निरा…
  66. Verse 81यह जगत्‌ न तो उत्पन्न होता है, न उत्पन्न होकर विनष्ट होता है ओर न कभी भविष्य में होनेवाला…
  67. Verse 82न जगत्‌ है, न कभी था ओर न कभी होगा । यह परम शान्त चिदाकाशका आत्मा में ही अवभास हो रहा है
  68. Verse 83जैसे स्वप्न में चिन्मय ही नगर पर्वत आदि के रूप से प्रकाश में आता है वैसे ही इस जगत्‌ नामक…
  69. Verse 84सृष्टि के आरम्भ में पृथिवी आदि पदार्थों की सत्ता ही नहीं है, इसलिए पार्थिव आदि देह का कैस…
  70. Verse 85स्वयम्भू नाम का अपना शरीर महाचिति का पहला स्वप्न है । तदनन्तर स्वयम्भू शरीर से उत्पन्न हु…
  71. Verse 86इसलिए जैसे गलगण्ड में (गण्डमाला में) निकले हुए फोड़े का गले से साक्षात्‌ सम्बन्ध नहीं है…
  72. Verse 87जैसे गला ही गण्डमाला के रूप में स्थित होकर गण्डमाला के ऊपर निकले हुए फोड़ के रूप से भी स्…
  73. Verse 88ब्रह्म से लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत्‌ स्वप्नजगत्‌ के समान अलीक (असत्य) ही उत्पन्न होता है…
  74. Verse 89जैसे स्वप्न में चिदाकाश ही जगत्‌ का रूप धारण कर लीन हो जाता है वैसे ही जाग्रत नामक स्वप्न…
  75. Verse 90यदि जग्रत्‌ असत्‌ (अचरत) है तो इसका अनुभव कैसे होता हैं और कैसे यह सत्य की नाई स्थित है,…
  76. Verse 91स्वप्ननगर आदि के समान ही निराकार होती हुई भी साकार-सी संवित्‌ जगत्‌ रूप से स्थित है । जैस…
  77. Verse 92आकाश से भी बढ़कर अणुता नाम का धर्म कहाँ प्रश्तिद्ध हैं ? जो कि संविकाकाश का (ब्रह्म का) ध…
  78. Verse 93यदि करई शंका करे कि इट आदि से नगर आदि की उत्पत्ति दिखलाई देती है अतः जयत्‌ से ही जयत्‌ की…
  79. Verse 94इस प्रकार स्वप्नपदार्थ और जाग्रत्पदार्थों का परस्पर भेद न होने पर स्वप्नपदार्थों का चिदाक…
  80. Verse 95उक्त अभेद में स्यन्द-कायु और वायु-आकाश दरष्टान्त हैं, यह कहते हैं / जैसे जो ही स्पन्दन है…
  81. Verse 96इसलिए चिदाकाश ही जगत्‌ के आकार में दिखाई देता है यह सब चिद्रूपी सूर्य का निराधार प्रकाशन…
  82. Verse 97यह समस्त जगत्‌ जन्मविनाशरहित अखण्डस्फुरणरूप निर्मल निर्विकार पत्थर के समान स्तब्ध शान्त (…
  83. Verse 98इस तरह वित्‌ की ग्रपंचशून्यता सिद्ध हुई. यह कहते हैं / इसलिए जरा आप कहिए तो सही कैसे पृथि…
  84. Verse 99हे श्रीरामचन्द्रजी, आप निर्विकार शुद्ध बोधरूप तत्त्व के परिज्ञान से उक्त तत्त्व में एकरूप…