Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verses 54–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 54,55
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
पदार्थों के रहते उनकी कासना की निकृति कैसे हो सकती हैं 2 इस कापर कहते हैं /
यदि पदार्थ सत्यरूप से रहें तो उनमें से अपने अनुकूल पदार्थो में यह मेरे लिए आवश्यक है
इसका मुझे सम्पादन करना चाहिये इत्यादि वासना होती है, किन्तु वे पदार्थ तो खरगोश के सींग
आदि की तरह यहाँ है ही नहीं, जगत् में जितने पदार्थ हैं, उनपर जब तक विचार नहीं किया जाता
तभी तक रमणीय प्रतीत होते हैं, वस्तुतः उनकी सत्ता है नहीं । विचार करने पर वे सामने खड़े ही
नहीं होते हैं, मालूम कहाँ विलीन हो जाते हैं