Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 22
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
ज्ञान दुर्लभ हैं, इस भय से श्रवण का त्याय कदापि नहीं करना चाहिये, यह कहते हैं /
जो जिस वस्तु को चाहता है, उसके लिए यत्न करता है और वह यदि थक कर बीच में ही
अपने विचार न बदल दे तो उसे अवश्य प्राप्त करता है