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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 94

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 94 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 94

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्वप्नपदार्थ और जाग्रत्पदार्थों का परस्पर भेद न होने पर स्वप्नपदार्थों का चिदाकाश से भेद न होने के कारण जाग्रत्पदार्थों का भी चिदाकाथ से अभेद सिद्ध हो गया उस्र अभिप्राय से कहते हैं / जैसे शून्य और आकाश का परस्पर कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही है वैसे ही स्वप्न- पर्वत ओर चिदाकाश में भी परस्पर भेद नहीं है, दोनों अभिन्न हैं जो चिदाकाश है, वही स्वप्न-नगर है