Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 16
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
वे बोध ओर अबोध कोन हैं ? इस आशंका पर कहते हैं ।
बोध और अबोध चिदाकाश का ही निरामय (निर्विकार) रूप है, जड़का नहीं है, इसलिए
चिदाकाशरूप से वह एक ही है । बोध के बिना अबोध का रूप ही प्रसिद्ध नहीं होता और
बोध हो जाने पर अबोध का संभव नहीं है, इसलिए "राहोः शिरः" (राहु का सिर), "शिर एव
राहुः" (सिर ही राहु) इसके समान केवल वाणीमात्र से भेद है, किन्तु अर्थ में कुछ भेद नहीं
है । इसलिए दृश्यता है ही नहीं