Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 56
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यद्यपि ये पदार्थ वेदान्तियों के विचार में नहीं हैं तथापि कपिल, कणाद आदि के विचार में तो
हैं ही, ऐसी अवस्था में आपने उन्हे असत्य ही केसे मान लिया 2 इस शंका पर कहते हैं /
प्रामाणिक विचार करने पर जो जगत्पदार्थ नहीं टिकते हैं, वे कैसे हैं उनका क्या स्वरूप
है ? वे एक एक वस्तुरूप हैं या सर्व वस्तुरूप हैं, सदा ही रहते हैं, या कभी ही रहते हैं ?
सभी प्रकार से पहले सैकड़ों बार हम उनका खण्डन कर चुके हैं, यह अर्थ है