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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 64

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जयदृज्नानरुप होने के कारण भी चित्‌ जगत्कारण नहीं हो सकता क्योकि घटज्ञान में घटकारणता नहीं दिखाई देती, ऐसा कहते हैं / कहिये तो सही जगत्‌-मात्र का अज्ञानरूप चित्‌ पृथिवी आदि का कारण कैसे हो सकता है ? चित्‌ में अचित्‌ की स्थिति नहीं हो सकती, इग्नलिए भी चित्‌ जगत्‌ का कारण नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं / भला कहिये तो सही धूप में छाया कैसे रह सकती है ?