Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verses 47–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verses 47–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 47
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि प्रश्न हो कि यदि ऐसा है, तो आप हम लोगों एवं अन्य अज्ञानियों के साथ क्यों मित्रता
करते हैं 2 मित्रता के कारण ही तो आप दयावश उपदेश देने के लिए ग्रवृत्त हुए हैं ? इस पर
कहते हैं /
हे श्रीरामजी, ये श्रोता लोग जिस प्रकार के अधिकारी हैं, आप जैसे अधिकारी हैं और जैसी
श्रवण-धारणा के अभ्यास में पटु आप लोगों की बुद्धियाँ हैं एवं जैसे मैं आप लोगों को उपदेश देने
के लिए आपके पिताजी द्वारा आज्ञप्त हुआ यह सब मैं भलीभाँति जानता हूँ । अतः आप लोगों के
महाभाग्योदय से जागी हुई करुणा से आप लोगों को उपदेश देने में प्रवृत्त हुआ हूँ, चूँकि मेरा स्वभाव
ही ऐसा है, दीनजनों के प्रति मेरी दया सदा जागी रहती है, निष्ठुरता का तो मुझमें नाम तक नहीं
है, इसलिए आप लोगों का हित चाहनेवाले मेरे वचनं पर आप लोग आदर करें, यह भाव है