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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 46

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अतएव इस शास्त्र की अवहेलना करनेवालों के साथ श्रूल कर भी कभी मैत्री नहीं करनी चाहिये, यह कहते हैं / अज्ञान से, डाह से अथवा मोह से इस शास्त्र की अवहेलना करनेवाले अविवेकी आत्महत्यारों (५) के साथ कदापि मित्रता नहीं करना चाहिये