Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 70
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इस कथन से वायु ही परमाणु का सधात करेगा, दुद्षिपूर्वक व्यापार के बिना ही अणुर्जे का
सधात (मिलन) हो जायेगा, इस आशंका का भी निराकरण हो गया, ऐसा कहते हैं /
जड़ वायु की बुद्धिपूर्वक चेष्टा नहीं है । बुद्धिपूर्वक चेष्टा के बिना परमाणुओं का एकत्रीकरण
नहीं हो सकता । जड़ और सर्वज्ञ से (ईश्वर से) अतिरिक्त जीव, प्रलय में शरीर नहीं होने
के कारण, असमर्थ ही था, इसलिए सृष्टि के आरम्भ में इसके किसी कर्ता की उपपत्ति नहीं
हो सकती है