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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 90

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verse 90 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 90

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि जग्रत्‌ असत्‌ (अचरत) है तो इसका अनुभव कैसे होता हैं और कैसे यह सत्य की नाई स्थित है, क्योकि खरगोश के कीर्णो मः जो असद्‌ हैं; ये दोनों बातें नहीं दिखाई देती 2 इस शक्रा पर कहते हैं / जैसे स्वप्न में संवित्‌ ही नगर, पर्वत, नदी आदि के रूप से उदित होती है वैसे ही अलीक (असत्‌) होते भी अनुभूत ओर असत्‌ होते भी सत्यवत्‌ स्थित यह जगत्‌ संवित्‌ से ही उदित है, अतः संविद्रूप ही है । शून्यरूप नहीं है