Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verses 66–68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, verses 66–68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 66-68
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि परमाणु आपस में मिलकर जगत् की रचना करें तो उनका सदा आकाश में उड़ना, गिरना
दिखाई देने के कारण प्रत्येक घर में प्रतिदिन पहाड़ की चोटी-सी और कुएँ का यज्ञ-सत्रा हो
जायेया, ऐसा कहते हैं /
यदि परमाणुओं का समूह मिलकर जगत् की रचना करता, तो अवयवभूत वे जब चाहते
तब आकाश में उड़ते और जब चाहते नीचे गिरते इस प्रकार जगह-जगह, घर-घर प्रतिदिन
उसकी अपूर्व धूलि की अम्बार लग जाती अथवा बड़ा गङ्का हो जाता और दूसरी बात यह भी
है कि परमाणु नामक निरवयव कोई द्रव्य किसी को दिखाई नहीं देता है, जालों के अन्दर सूर्य-
किरणों मेँ सावयव ही रज:कण दिखाई देते हैं यदि किये उन्हींके अवयव जहाँ तक हो सकते
हैं उसकी चरमसीमा निरवयव है ऐसा अनुमान होता है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि वह
परस्पर संयोग के अयोग्य होने से अद्रव्य हो जायेगा निरवय का अन्य के साथ संयोग नहीं
हो सकता । संयोग एक देश में होता है ऐसा नियम है । संयोग न होने से द्रयणुक आदि की
सिद्धि नहीं होगी । दूसरी बात यह भी विचारणीय है कि अतीन्द्रिय आकाशपुष्प से परमाणुओं
के संयोजन द्वारा जगत् की रचना करना किसका काम है ? क्या किसी असंसारी पुरुष का
वह काम है या संसारी का ? संसारी की शक्ति तो परमाणुओं से जगत् की रचना करने में
कतई नहीं है, यह बिलकुल साफ है । यदि कहो कि संसार के अयोग्य ईश्वर या जड़ का यह
काम है, तो उनसे ईश्वर का बिना प्रयोजन के जगत् का निर्माण व्यर्थ है । नित्यमुक्त ईश्वर
को कोई प्रयोजन की अपेक्षा भी नहीं है अथवा सृष्टि का कोई प्रयोजन उपपत्तितः सिद्ध भी
नहीं किया जा सकता । ओर जड़ परमाणु अपने आप जगत् सृष्टि में प्रवृत्त नहीं हो सकते
हैं, यह भाव है