Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 100

45 verse-groups

  1. Verses 1–2दुःख निवृत्तितप मोष ठहरा वह उनको वांछनीय ही है इस आशय से कहते है) सकल दुःखो की निवृत्ति क…
  2. Verse 3संवित्‌ को अपने निश्वय के अनुसार ही विवर्त का अनुमान होता है, ऐसा नियम है / उक्त नियमों म…
  3. Verse 4जैसे भूताकाश सर्वव्यापक और शान्त है वैसे ही चिदाकाश भी सर्वव्यापी ओर शान्त है । वह चिदाका…
  4. Verse 5अन्य कस्तु के असभव में (सदेव सोम्येदमग्र आक्ीत्‌ (हे सोम्य. सृष्टि के पूर्व यह सद्‌ ही था…
  5. Verse 6यदि कड शंका करे कि हम ब्रह्मरूपी महाप्रलय ही नहीं मानते, जैसे बीजांकुर आदि की परम्परा अना…
  6. Verse 7जिन महापुरुषों का देह, इन्द्रिय आदि की सकल व्यवहारों में नियुक्ति करनेवाला प्रत्यगात्म चै…
  7. Verse 8असंग्रतः प्राप्त विषय की समाप्ति कर प्रस्तुत विष्य पर आते हैं । हृदय में जैसी संवित्‌ निर…
  8. Verse 9इसी कारण यद्यापि आत्मा स्रच्चिदानन्दघन है तथापि विरोधी दुःखित्वादिजञान की दढता से उसमें द…
  9. Verse 10यद्यपि जगत्‌ पूर्वोक्‍्त रीति से दुःखमय ही है तथापि यह निरतिशयानन्द चिदाकाश का स्फृरणमार…
  10. Verse 11उक्त अर्थ में (तत्र को मोह: कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ˆ (तत्त्वज्ञानावस्था में अग्रत को देख र…
  11. Verse 12अपने-अपने ठट निश्चय के अनुग्तार ही पदार्थ के अनुभव में संवित्‌ की प्रमाणता और चित्तवति की…
  12. Verse 13इसलिए स्रकलवादियों के अभिमत तत्‌-तत्‌ वेणो को धारण करने में समर्थ सवित्‌ ही आत्मा हैं, ऐस…
  13. Verse 14वह संवित्‌ सत्य हो अथवा असत्य हो उसे केवल अपनी कल्पना द्वारा (पृथिवी आदि कारणों की अपेक्ष…
  14. Verse 15संवित्‌ चाहे सत्य हो, चाहे असत्य हो, संविद्मात्र ही आत्मा है । उक्त संवितूमात्र आत्मा जिस…
  15. Verse 16जब सवित्‌ ही सव वादियों के अभिमत आत्मादि के रूप से स्थित होती हैँ तो ऐसी परिस्थिति में सत…
  16. Verse 17तो क्या सवित्‌ ही तत्‌-तत्‌ वादियों के अभिमत देहादि करे आकार से तत्‌-तद्‌ निश्वय के अनुला…
  17. Verse 18इसलिए पुण्य तीर्थ, पुण्य पर्व आदि देश काल में स्नान, दान आदि कर्मों से, रसायन, मन्त्र, औष…
  18. Verse 19बोध होने पर जब अविद्या छिन्न-भिन्न हो चुकी पुनः उसके आविभरवि में कोड कारण नहीं है ओर दूसर…
  19. Verse 20संवित्‌ ही मनुष्यों का जीव (जीवात्मा) है उसकी जैसी दृढ़ भावना होती है वैसा ही पुरुष सुखी…
  20. Verse 21प्रत्यगात्मरूप संवित्‌ ही जब तत्वतः ज्ञात होती है तब अपने कार्यभ्रूत बन्ध को दूर करती हैं…
  21. Verse 22कैसे अन्धकार ही शेष रह जाता है 2 ऐसा कड प्रश्न करे तो उस फर कहते हैं । चूँकि स्वप्रकाशरूप…
  22. Verses 23–25कभी भी इससे विलक्षण जग्रत्‌ नहीं था यानी जगत्‌ का अभाव नहीं था ऐसा मानकर जो महाप्रलय नहीं…
  23. Verse 26श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, यहाँपर एक तो पूर्वोक्त ही (शास्त्रशून्यवे हम तत्त्वज्ञान…
  24. Verses 27–28हे पुरुषश्रेष्ठ, इस प्रकार के आशावाले जिस पुरुष का आपने प्रतिपादन किया है क्या वह देह से…
  25. Verse 29तीसरे पक्ष में कहते हैं / अवयवघटित स्थूल शरीर को आत्मा समझनेवाले ने स्थूल देह के अवश्यम्भ…
  26. Verse 30वतुर्थ पक्ष में कहते हैं / शुद्धसंवित्‌ को आत्मा माननेवाला जीवन्मुक्त सदा सब जगह लीला से…
  27. Verse 31छठे पक्ष में कहते हैं अथवा यदि *संवित्ति नहीं है" इस प्रकार का निश्चयवाला (संवित्‌ का अपल…
  28. Verses 32–33उसने उच्च अवस्था में क्या अथवा केसा देखा 2 इस पर कहते हैं / मरणपर्यन्त दृढीकृत अपने उक्त…
  29. Verse 34जो शून्यवादी हैं; जिनका आत्मा के अभाव में द्ढ़ निश्वय हैं, वे जब मरते है तव किस गति को जा…
  30. Verses 35–36जो लोग जगत्‌ को स्थिर मानते हैं और जो लोग क्षणिक मानते हैं; उन दोनों के ही छुख- दुः:खभोयप…
  31. Verse 37तत््वज्ञानियों का भूमि आदि थ्रूर्तों की क्षणिकता और स्थिरता में को आग्रह नहीं हैं / अध्यस…
  32. Verse 38इसलिए कूटस्थ चित्‌ से विवर्त रूप से चिद्‌ से व्याप्त देहपर्यन्‍त जड़प्रपंच की उत्पत्ति मा…
  33. Verse 39ऊीक्समष्टिरूय एक हिरण्यगर्भ ही नाना जीवों के रूप से ऊपर नीचे लोको म गमन आदि द्वारा संसारी…
  34. Verse 40हिरण्यगर्भ की जो कर्तुक़प नाना जीवों की समष्टिरूपता हैं. वह भी हिरण्यग्वित्‌ की स्वकल्पना…
  35. Verse 41इस प्रकार से भी वही प्रिद्ध हुआ जिसकी हमने पहले प्रतिज्ञा की थी, ऐसा कहते हैं / जो जिस पद…
  36. Verse 42इसलिए उन जीकवेतन्यो की विचित्र-विवित्र वास्ननाओं के अनुरूप तत्‌-तत्‌ सृष्टि के चेतनों की…
  37. Verse 43जैसे स्वप्न मेँ चिदाकाश ही मनुष्य के प्रति नगरी का रूप धारण करता है वैसे ही आदि सृष्टि से…
  38. Verse 44सहकारी कारणों के बिना ही सृष्टि के आदि में केवल प्रतिभामात्र से प्रिद्ध होने के कारण भरी…
  39. Verse 45स्वप्ननगर में नगर के अवयवरूप महल, घर आदि के उत्तरोत्तर भूमिका-भेद जो अर्धविकासवश अपूर्ण क…
  40. Verse 46द्वैत और एेक्य से विहीन ये सकल प्रजाजन चिदाकाशरूप ही हैं । चिदाकाश में दूसरी रंजना (राग-द…
  41. Verse 47त्रिविध ताप की शान्ति करने के कारण शीतल, आह्लादजनक चित्रूप चांदनी चारों ओर चेतनारूपी प्रक…
  42. Verse 48सृष्टि के पूर्व ओर सृष्टि के बाद (प्रलय में) सृष्टिरहित स्वभाववाले चिन्मय आकाश में केवल आ…
  43. Verse 49विति यदि अयनी स्ता के बल से सत्‌ बना कर जगत्‌ को देखती हे तव तो कुछ भी असद्‌ नहीं कहा जा…
  44. Verse 50शरत्‌ ऋतु के समान निर्मल ज्ञानवाले शान्तचित्त तथा परम तत्त्व का साक्षात्कार कर चुके पुरुष…
  45. Verse 51उनकी उस प्रकार की स्थिति की लक्षण द्वारा पहचान कराते हैं / मान और मोह से विहीन, संगरूपी द…