Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अङ्गानां स्वप्ननगरे वसुधा विविधाः कृताः ।
यास्ता एव जगत्स्वप्ननगरे पुष्टतां गताः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्ननगर
में नगर के अवयवरूप महल, घर आदि के उत्तरोत्तर भूमिका-भेद जो अर्धविकासवश अपूर्ण
किये गये थे, वे ही जगत्रूप स्वप्ननगर में पूर्ण विकास द्वारा पुष्टता को प्राप्त हुए हैं