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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

प्रामाण्यं सर्वशास्त्राणामेतेनैव प्रसिद्ध्यति । सर्वसिद्धान्तसिद्धान्त एष एवेति मे मतिः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जब सवित्‌ ही सव वादियों के अभिमत आत्मादि के रूप से स्थित होती हैँ तो ऐसी परिस्थिति में सत्य होने और उसके द्वारा कल्पित पदार्थों के तत्‌-तत्‌ अभिमत अर्थक्रिया में समर्थ होने के कारण पूर्वोक्‍्त सकलशास््रों का प्रामाण्य अक्षुण्ण ही रहा, यह कहते हैं । संविद्‌-मात्र आत्मा से ही सब शास्त्रों का प्रामाण्य अक्षुण्ण होता है और यह संविद्‌-अद्वैतात्मवाद सिद्धान्त ही सब वादियों का उपजीव्य होने और पुरुषार्थ हेतु होने से सब सिद्धान्तों का शिरोमणि सिद्धान्त है