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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verses 27–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

ईदृग्भावस्त्वया प्रोक्तो यः पुमान्पुरुषोत्तम । स तावच्चेतनामात्रं भवतीत्यनुभूयते ॥ २७ ॥ स चाकारविनाशेन युज्यते नात्र संशयः । अथाविनाशो देहश्चेत्तदुःखस्यात्र कः क्रमः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे पुरुषश्रेष्ठ, इस प्रकार के आशावाले जिस पुरुष का आपने प्रतिपादन किया है क्या वह देह से अतिरिक्त चेतन को आत्मा माननेवाला है, या नित्य आतिवाहिक सूक्ष्म देह को आत्मा माननेवाला है या शुद्ध संवित्‌ को आत्मा माननेवाला है या अज्ञान से आवृत संवित्‌ को आत्मा माननेवाला है या संवित्‌ का अपलाप माननेवाला है ? यदि वह चेतनामात्र का (चिदाभासरूप का) अस्तित्व स्वीकार करता है तो उसे क्रम से आत्मतत्त्व का अनुभव होता ही है, उसके संसार से उद्धार में कोई कठिनाई नहीं हे, क्योकि देहादि आकारवाली उपाधि का विनाश होने से वह परमात्मा के साथ मिल जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है । यदि उसकी विनाशी अन्नमय देह में आत्मबुद्धि हो, तो उसे चारों ओर से विनाश की शंका से दुःख होगा ही । उसको दुःखप्राप्ति नहीं हो सकती क्योकि इस प्रकार क्रमशः उपदेश देने पर-ज्ञानचर्चा सुनाने पर-वह भी आत्मतत्त्व को प्राप्त हो ही जायेगा