Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
नित्या निरन्तरोदेति यादृशी संविदाशये ।
भूयते तन्मयेनैव पुंसा देहोऽस्तु माथवा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
असंग्रतः प्राप्त विषय की समाप्ति कर प्रस्तुत विष्य पर आते हैं ।
हृदय में जैसी संवित् निरवच्छिन्नरूप से सदा उदित होती है मनुष्य वैसा ही हो जाता है । देह
हो चाहे न हो । भाव यह है कि चार्वाकों के संमत देहात्मभाव में भी वैसी दृढनिश्चयात्मक संवित् का
उदय ही अन्वय ओर व्यतिरेक से हेतु है, देह आदि व्यभिचरित होने से हेतु नहीं है