Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तस्मादबोधता यास्ते यथा संवित्तथैव सा ।
भवत्यकलुषाकारा तथैव फलभागिनी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या सवित् ही तत्-तत् वादियों के अभिमत देहादि करे आकार से तत्-तद् निश्वय के
अनुलार परिणत होती है 2 इस पर नकारात्मक उत्तर देते हैं /
संवित् में जो अबोधता यानी अविद्या है, वही तत्-तत् वादियों की जैसी संवित् होती है
परिणाम द्वारा प्रवृत्ति आदि के समय वैसे ही बन जाती है । वही जब तत्त्वज्ञान रूपसे परिणाम होने
पर निर्मल शुद्ध चिदाकार हो जाती है तब मोक्षफलभागिनी बन जाती है