Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
अद्यैवाद्यन्तयोर्व्योम्नि चिन्मये सर्गदर्शनम् ।
चिदुन्मेषनिमेषाभ्यां खात्मोदेत्यस्तमेति च ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टि के पूर्व ओर सृष्टि के बाद (प्रलय
में) सृष्टिरहित स्वभाववाले चिन्मय आकाश में केवल आज ही (वर्तमान क्षण में ही) सृष्टि का
दर्शन प्रसिद्ध है ओर वह आकाशरूप ब्रह्म ही है वह आत्मचित् के परिच्छिन्नरूप से उन्मेष
होने पर पलक भर में स्वप्न के तुल्य उदित होता है और आत्मचित् के अपरिच्छिन्नरूप से
निमेष होने पर अपने आप स्वप्न की भाँति अस्त हो जाता हे