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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यं यं निश्चयमादत्ते संविदन्तरखण्डितम् । तत्तथैवानुभवति प्रत्यक्षमिति सर्वगम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

संवित्‌ को अपने निश्वय के अनुसार ही विवर्त का अनुमान होता है, ऐसा नियम है / उक्त नियमों में ही स्रंवित्‌ की देहात्मभाव में भी उपपत्ति होती है ओर मोक्ष में भी उपपत्ति होती है / इस आशय से श्रीवश्तिष्ठजी उसका समर्थन करते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : संवित्‌ जो जो निश्चय करती है अपने अन्दर ज्यों का त्यों वही अनुभव करती है, यह बात सब लोगों के अनुभव से सिद्ध है