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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यथा खं सर्वगं शान्तं तथा चिद्व्योम सर्वगम् । तदेवैक्यमथ द्वैतमन्यार्थस्यात्यसंभवात् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भूताकाश सर्वव्यापक और शान्त है वैसे ही चिदाकाश भी सर्वव्यापी ओर शान्त है । वह चिदाकाश ही विविध वादवाले पामर लोगों से कल्पित देहादि द्वैत ओर वेदान्त के मर्म को जाननेवाले विद्वानों के अनुभव से सिद्ध अद्वैत भी है, क्योकि उससे अतिरिक्त वस्तु का अत्यन्त असंभव है