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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

बोधाच्चेत्संविदो जातः स दुःखी पुरुषो भवेत् । विरुद्धं वेदनं यावत्तावज्जीवोऽङ्ग तन्मयः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी कारण यद्यापि आत्मा स्रच्चिदानन्दघन है तथापि विरोधी दुःखित्वादिजञान की दढता से उसमें दु-खमयता सबको अनुभव से सिद्ध हैं. ऐसा कहते हैं / हे श्रीरामजी, यदि संवित्‌ के बोध से पुरुष दुःखी हुआ है, तो जब तक विरुद्ध दुःखित्व ज्ञान रहेगा तभी तक जीव दुःखमय रहेगा