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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

स्थैर्यास्थैर्येण भूतानां किमपूर्वमतौ भवेत् । भूतस्थैर्ये तथास्थैर्ये सुखं चैवासुखं समम् ॥ ३५ ॥ स्थिरमस्त्वस्थिरं वापि मह्यादिमहतामपि । चिद्भामात्रमिदं भाति यावदज्ञानमाततम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो लोग जगत्‌ को स्थिर मानते हैं और जो लोग क्षणिक मानते हैं; उन दोनों के ही छुख- दुः:खभोयपर्यन्त सभी व्यवहार समान हैं, यह कहते हैं । स्थिरता और क्षणिकता से जगद्व्यवहार वैचित्र्यबुद्धि में क्या अन्तर होगा ? भूत (पदार्थ) चाहे स्थिर हों चाहे अस्थिर (क्षणिक) हों, सुख और दुःख तो समान ही होंगे