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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

आविर्भवति सा भूयः क्षीणाशङ्का क्षणेन चेत् । तत्केन संविदो दुःखं कदा नामोपशाम्यति ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

बोध होने पर जब अविद्या छिन्न-भिन्न हो चुकी पुनः उसके आविभरवि में कोड कारण नहीं है ओर दूसरी बात यह भी है कि यदि उसका पुनः आविभाव माना जाय, तो मोक्ष कभी होगा ही नहीं: क्योंकि जब-जब ज्ञान द्वारा वह बाधित होगी, एन: उसका आविभाव हो जायेगा ऐसा कहते हैं / आत्यन्तिक बाध से क्षीण हुई अविद्या की पुनः प्राप्ति की आशंका भी नहीं है । यदि अविद्या एक बार बाधित होकर पुनः क्षणभर में आविर्भूत हो जायेगी, तो जीवका दुःख कब किससे शान्त होगा यानी कभी भी किसी से भी शान्त न हो सकेगा