Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
न देहः पुरुषो वापि जीवोऽन्य उपलभ्यते ।
संवित्सर्वमिदं सा तु यथा वेत्ति तथा जगत् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए स्रकलवादियों के अभिमत तत्-तत् वेणो को धारण करने में समर्थ सवित् ही
आत्मा हैं, ऐसा सब वादियों को स्मझाकर सव कृतकृत्य (्रफलमनोरथ) किये जा सकते हैं;
उस्र अभिप्राय से कहते हैं /
चार्वाकों का अभिमत शरीर, सांख्यो का अभिमत पुरुष और मीमांसक आदि का अभिमत
जीव या भोक्ता संवित् से पृथक् उपलब्ध नहीं होता, अतः सब वादियों के कल्पनास्थान देह आदि
संवित् ही है । वह (संवित्) जैसा अनुभव करती है वैसा ही जगत् हो जाता है