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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

संवित्सत्यास्त्वसत्या वा निश्चयस्तावदीदृशः । आबालमेतत्संसिद्धं केनापह्नूयते कथम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने-अपने ठट निश्चय के अनुग्तार ही पदार्थ के अनुभव में संवित्‌ की प्रमाणता और चित्तवति की सत्यता ठीक नहीं हैं, देहात्मभाव में पहली की (क्षवित्‌ को) प्रमाणता नहीं है और अल्यग्राक्षात्कासृत्ति में दूसरी /बित्तवृत्ति की सत्यता / नहीं है इस आशय से कहते हैं । संवित्‌ सत्य (प्रमा) है ओर चित्तवृत्ति सत्य (अबाधित) है ऐसा दोनों का नियम नहीं है। किन्तु निश्चय इस तरह के सत्‌ और असत्‌ अर्थ के अनुभव में कारण होता ही है, यह आबालवृद्ध प्रसिद्ध है। इसका कौन कैसे अपलाप कर सकता है ? भाव यह कि अनुभव विरुद्ध का आश्रय लेकर अनुभव का अपलाप नहीं किया जा सकता