Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यत्तयैव च संवित्त्या वेदनेनैव लभ्यते ।
अयं स्वभावज्ञप्त्यान्तर्जाड्यं पुंसेव निद्रया ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे अन्धकार ही शेष रह जाता है 2 ऐसा कड प्रश्न करे तो उस फर कहते हैं ।
चूँकि स्वप्रकाशरूप उसीसे प्रत्यगात्मसंवित्रूप जीव को निद्रा द्वारा अपनी जडता के सदृश
अन्धकारतुल्य अज्ञान से यह प्रपंच प्राप्त हुआ है, यदि संवित् का अपलाप किया जाय, तो
असाक्षिक अन्धकार ही शेष रह जायेगा