Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
येषां विद्भ्यः शरीराणि ते वन्द्याः पुरुषोत्तमाः ।
शरीरेभ्यो विदो येषां तैरलं पुरुषाधमैः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए कूटस्थ चित् से विवर्त रूप से चिद् से व्याप्त देहपर्यन्त जड़प्रपंच की उत्पत्ति माननेवाले
धन्य हैं; क्योंकि उनके मत में वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्“ वाचारम्भणन्याय से विकार को
असत्य स्रमझने पर वित् ही अवशिष्ट रहता है / अचिद् देह आदि से चित् की उत्पत्ति माननेवाले
चावक; नैयायिक आदि मूर्खा है / वित् के विनाश से जड़ का परिशेष न तो पुरुषार्थ हैं और न
युरूगार्थ का साधन ही है, इस आशय से कहते है/
जिनके मत में चित् से शरीरों की उत्पत्ति है, वे पुरुष श्रेष्ठ वन्दनीय हैँ । जिनके मत में शरीर
से चित् की उत्पत्ति होती है, उन पुरुषाधमों से भाषण करना भी ठीक नहीं है