Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
ये चापि स्वप्नपुरवत्सर्वं पश्यन्ति चिन्मयाः ।
तेषामिदमिवाशेषं जगज्जालं प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो शून्यवादी हैं; जिनका आत्मा के अभाव में द्ढ़ निश्वय हैं, वे जब मरते है तव किस गति को
जाते हैं ? इस पर कहते हैं ।
जिनके मत में शुद्ध संवित् के अस्तित्व का संभव नहीं है, वे जब शरीररहित होते हैं यानी मरते
हैं तब जड़ को तत्त्व माननेवाले वे जड़ होकर दुर्भेद्य अन्धकार से पूर्ण होते हैँ । इस विषय में श्रुति
भी कहती है ~ “असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के
चात्महनो जनाः ।* (जो अज्ञानी लोग हैं वे लोग मरकर गाढ़ अन्धकार से आच्छन्न असुर्य नामक
लोकों मेँ जाते हैं) ॥३ ३॥
जो विज्ञानवादी लोग क्षणिक विज्ञानमय जगत् स्वप्ननयर के तुल्य है. यह मानते हैं; उनको भी
व्यवहारकतिद्धि पूर्वोकत मतवाले के मान हैं, ऐसा कहते हैं /
क्षणिक और विकार चित् को आत्मा माननेवाले जो विज्ञानवादी लोग सम्पूर्ण जगत् को
स्वप्ननगर के समान देखते हैं, उनका यह सारा का सारा जगज्जाल प्रवृत्त ही रहता है, निवृत्त
नहीं होता