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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 51

पचासर्वौँ सर्ग समाप्त इक्यावनवों सर्ग शान्त परम पद में विश्रान्ति की इच्छा कर रहे उद्दालक मुनि के मन के विविध दोषों से विक्षेप का बहुत प्रकार से वर्णन ।

43 verse-groups

  1. Verse 1श्रवण ओर मनन से आत्मतत्व का निर्णय होने पर भी चित्तविश्रान्ति के बिना विक्षेपरहित जीवन्मु…
  2. Verse 2हे नीतिशास्त्र के मर्मज्ञ, सत्‌कूलरूपी खेत में उत्पन्न हुई देहरूपी लता में चित्तशुद्धि, श…
  3. Verse 3वह बाल्यावस्था से यदि सीची जाय, तो बढ़ती है । वृद्धावस्था आदि से देहरूपी लता के मुरझाने प…
  4. Verse 4आगे कहे जानेवाले आख्यानरूप मेरे वाक्य के अर्थ का श्रवण पूर्वक बार-बार मनन करना विवेक सेक…
  5. Verse 5उक्त आख्यायिका का अवतरण कर उसके अर्थ विचार कर्तव्यता को कहते हैं। तत्‌" ओर त्वम्‌! आदिपदा…
  6. Verse 6श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवान्‌, उद्दालक मुनि ने किस क्रम-से-उन पंचमहाभूतों को छिन्न-…
  7. Verse 7श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस प्रकार प्राचीन काल में उद्दालक मुनि ने पंचम…
  8. Verses 8–11इस जगत्रूपी जीर्ण-शीर्ण घर के किसी विस्तृत कोने में, जो पर्वतरूपी उल्टे करके रक्खे हुए बर…
  9. Verses 12–13उस गन्धमादन पर्वत के भूमि भाग पर किसी एक उठे हुए शिखर पर, जिसमें सीधे वृक्ष हैं, टखनों तक…
  10. Verse 14पहले तो वे अल्प प्रज्ञावाले, अविचारवान्‌, परमपद में विश्रान्ति को अप्राप्त, अप्रबुद्ध तथा…
  11. Verse 15तदनन्तर क्रमशः तपस्या से शास्त्रार्थ के नियमों के अभ्यास परिपाक से क्रमों से उन्हें विवेक…
  12. Verse 16तदनन्तर एकान्त मेँ ही निवास कर रहे, संसाररूपी रोग से भयभीत बुद्धिवाले, पवित्र, मनवाले उन्…
  13. Verse 17प्राप्त करने योग्य पुरुषार्थो में से प्रधान मोक्षरूप पुरुषार्थ क्या है ? इसमें विश्रान्ति…
  14. Verse 18जैसे मेरु पर्वत के शिखर पर मेघ चिरकाल तक विश्राम को प्राप्त होता है वैसे ही जिसमें मन के…
  15. Verse 19जैसे चंचल (अशान्त) कल्लोलों की ध्वनि के समान ध्वनिवाली तरंगे समुद्र मँ शान्त हो जाती हैं…
  16. Verse 20मुझे यह कार्य करके यह भी दूसरा कार्य कर्तव्य है, इस कल्पना का मैं परमपद में विश्रान्त बुद…
  17. Verse 21जैसे कमल के पत्ते में स्थित जल भी स्पर्श न होने के कारण कमल के पत्ते मे नहीं लगता वैसे ही…
  18. Verse 22मैं बहुत-सी बड़ी-बड़ी तरगों से भरी हुई तथा अविवेक से खूब बढ़ी हुई तृष्णारूपी नदी को विवेक…
  19. Verse 23मैं जगत्‌ के प्राणियों से की जा रही असन्मयी तथा चित्त को व्यग्र करनेवाली इस बाह्न प्रवृत्…
  20. Verse 24जैसे जिसका उन्माद रूपी वात रोग निवृत्त हो चुका हो ऐसे पुरुष की विक्षिप्तता शान्त हो जाती…
  21. Verse 25आविरभूत हुए स्वरूप के प्रकाश के छिटकने से जगत्‌ की विविध गतियो का उपहास कर रहा मैं ब्रह्म…
  22. Verse 26जैसे मंथन से उत्पन्न विक्षेप से मुक्त हुआ क्षीरसागर समाधिस्थ भगवान्‌ श्रीविष्णु से सुशोभि…
  23. Verse 27सैकड़ों आशापाशरूपी इस अचल-अटल सारी दृश्यशोभा को सन्मात्ररूप से देख रहा मैं कब अपने अन्दर…
  24. Verse 28जिसकी कल्पनार्पँ शान्त हो गई ऐसी बुद्धि से बाहरी और भीतरी सारे प्रपंच को चिन्मात्र देख रह…
  25. Verses 29–34जिसका चित्त शान्त हो गया है ऐसे स्वरूपवाला अतएव उत्तम चिदेकरसता को प्राप्त हुआ मैं जन्मान…
  26. Verses 35–36अभ्यास से प्राप्त होने योग्य सुन्दर चैतन्यरूपी प्रकाश से बाधितानुवृत्तिरूप होने के कारण त…
  27. Verse 37ध्यान में स्थिर बुद्धिवाले अतएव पर्वत के ठ के समान निश्चल स्थितिवाले मेरे वक्षःस्थल पर लम…
  28. Verse 38इस प्रकार की चिन्ताओं से परवश हुए उद्दालक नाम के ब्राह्मण ने बार-बार ध्यान में बैठते हुए…
  29. Verse 39किन्तु विषयों से हरे जा रहे अतएव बन्दर के समान चंचल चित्त में प्रसन्नता प्रदान करने वाली…
  30. Verse 40किसी एक समय बाह्य विषयों के संबन्ध के त्याग के अनन्तर उनका चित्तरूपी वानर सात्त्विक देवता…
  31. Verse 41किसी समय उनका मनरूपी वानर चंचलतावश अन्दर होनेवाले समाधि सुख-सम्बन्ध का त्याग कर जैसे विष…
  32. Verse 42हे कमलनयन, कभी उनका मन हृदयाकाश मेँ उदित हुए सूर्य के सदृश तेज को ([--)) देखकर विषयों में…
  33. Verse 43अभिव्यक्ति से त्याग कर (कुछ शमन कर) उसी समय विषय वासना के जागने से विषय लम्पट होकर भयभीत…
  34. Verse 44कभी उनका मन बाह्य स्पर्शो का (विषयों के सम्बन्धों का) और आभ्यन्तर स्पर्शो का (समाधिसुख-सम…
  35. Verses 45–46जैसे वायु द्वारा तटवर्ती जल में डूबाया गया और तट की लहरों से हिलाया जा रहा वृक्ष बड़े संक…
  36. Verse 47तदनन्तर व्याकुल मनवाले मुनि जैसे सूर्य प्रतिदिन महामेरु में अकेले ही भ्रमण करते हैं वैसे…
  37. Verse 48एक समय वे सब प्राणियों से दुष्प्राप्य एवं सबके संचार से रहित कन्दरा में ऐसे ही पहुँचे जैस…
  38. Verse 49उस कन्दरा में वायु द्वारा विक्षेप-व्याकुलता न थी, कोई मृग-पक्षी वहाँ कभी नहीं पहुँचे थे,…
  39. Verse 50पुष्पों की राशियों से वह कन्दरा चारों ओर आच्छन्न थी, नरम हरी घास से ढकी होने से बड़ी भली…
  40. Verse 51उसके दरवाजे पर बडी मीठी ओर दण्डी छाया थी, रत्नरूपी दीपको से वह जगमगाती थी ओर वनदेवियों के…
  41. Verse 52उसके दरवाजे पर केवल शीत निवारण करनेवाले आलोक फलते थे, शरद्‌ ऋतु के प्रातःकालीन सूर्य की प…
  42. Verse 53वह गुफा बाल सूर्य से सूखी हुई थी (इससे यह व्यक्त होता है कि उसका मुँह पूर्व की ओर था) उसम…
  43. Verse 54वह गुफा कमल के मध्यभाग के समान कोमल थी, अतएव ब्रह्मा के विश्राम के योग्य थी, चारों ओर फूल…