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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

तृष्णाकरञ्जजटिलां जन्मजर्जरगुल्मिकाम् । संसारारण्यसरसीं त्यक्त्वा यास्याम्यहं कदा ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

ध्यान में स्थिर बुद्धिवाले अतएव पर्वत के ठ के समान निश्चल स्थितिवाले मेरे वक्षःस्थल पर लम्बमान जटाओं के अग्रभाग में बनाये गये घोंसले में चिड़ियाँ कब नि:शंक होकर विश्राम लेगी ? ॥३ ६॥ तृष्णारूपी कंजे के वृक्षों से चारों ओर व्याप्त, काम आदिरूपी मृगों से जर्जर जन्मरूपी झाड़ियों से भरे हुए संसाररूपी जंगली तालाब का त्यागकर मैं कब जाऊँगा ?