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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परिदीर्घासु तन्वीषु सुतीक्ष्णासु सितासु च । क्षुरधारोपमानासु चित्तवृत्तिषु तिष्ठ मा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रवण ओर मनन से आत्मतत्व का निर्णय होने पर भी चित्तविश्रान्ति के बिना विक्षेपरहित जीवन्मुक्त सुख की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए विक्षेपशून्य जीवन्मुक्ति सुख के लिए समाधि के अभ्यासो में तत्परता के साथ बोध वृद्धि की अत्यन्त आवश्यकता है, यो उद्दालक-वरित्रवर्णन के द्वारा उपदेश देने की इच्छावाले श्रीवसिष्ठजी उद्दालक चरित्र के वर्णन के लिए पहले चित्त के चरित्रों में अविश्वसनीयता कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐहिक, पारलौकिक और दूर स्थित विषयों मेँ आसक्ति होने के कारण बड़े लम्बे, वासनाप्रचुर हाने के कारण अत्यन्त महीन, प्रमाद कर रहे पुरुष के तुरन्त ही समाधि सुख के विच्छेद के हेतु होने के कारण अत्यन्त तीक्ष्ण, आत्मा के प्रतिबिम्ब के ग्रहण में योग्यतारूप निर्मलता होने के कारण सफेद अतएव छूरे की धार के तुल्य चित्त के चरितों में प्रमादवश विश्वस्त मत रहिये

सर्ग सन्दर्भ

पचासर्वौँ सर्ग समाप्त इक्यावनवों सर्ग शान्त परम पद में विश्रान्ति की इच्छा कर रहे उद्दालक मुनि के मन के विविध दोषों से विक्षेप का बहुत प्रकार से वर्णन ।