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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

कदाचिदान्तरान् स्पर्शान्परित्यज्य मनःकपिः । लोलत्वात्तस्य संयातो विषयं विषदग्धवत् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी समय उनका मनरूपी वानर चंचलतावश अन्दर होनेवाले समाधि सुख-सम्बन्ध का त्याग कर जैसे विष से मरा हुआ पुरुष जठराग्नि सम्बन्धी देह की उष्णता का त्यागकर अन्य लोक में जाता है वैसे ही विषयों को प्राप्त हुआ