Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
निरंशध्यानविश्रान्तेर्मूकस्य मम मूर्धनि ।
कदा तार्णं करिष्यन्ति कुलायं वनघूर्णिकाः ॥ ३५ ॥
कदा निःशङ्कमुरसि ध्यानधीरधियः खगाः ।
मम विश्रान्तिमेष्यन्ति शैलस्थाण्वचलस्थितेः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
अभ्यास से प्राप्त होने योग्य सुन्दर चैतन्यरूपी प्रकाश से बाधितानुवृत्तिरूप
होने के कारण तुच्छ (थोड़ी बची हुई) आयुशेषरूप काल कला को आत्मा से सम्बन्ध न होने के कारण
दूर से ही कब देखूँगा ? ॥ ३ ०॥ इष्ट ओर अनिष्टों से निर्मुक्त हेय ओर उपादेय से रहित एवं स्वयंज्योति
परम पद में स्थित हुआ मैं कब अन्तःकरण में सन्तोष को प्राप्त होऊँगा ? ॥ ३ १॥ दुराशारूपी उल्लूओं
से भरी हुई, जिसने मूर्खता से (दूसरे पक्ष में बर्फ से) हृदयरूपी कमल को जीर्ण-शीर्ण कर दिया है तथा
मेरी यह अविद्या अन्धकाररूपी काली रात्रि कब नाश को प्राप्त होगी ? ॥ ३ २॥ पर्वत की गुफा मेँ निर्विकल्प
समाधि से शान्त मनोव्यापारवाला (चिदेकरसता से मनोवृत्तिरहित हुआ) मै कब शिला की समता को
प्राप्त होऊँगा ? ॥ ३ ३॥ मेरा अहंकाररूपी हाथी, जिसकी स्वांशभूत अभिमान वृत्तियाँ ही बड़े मदप्रवाह
हैं, परमार्थ सन्मात्र के ज्ञानरूप सिंह के द्वारा निहित होकर कब नाश को प्राप्त होगा ? ॥ ३ ४॥ निर्विकल्प
ध्यान में मग्न हुए मौन व्रतधारी मेरे मस्तक पर वनधूर्णिकाएँ (एक प्रकार की चिड़ियाँ) कब तिनकों का
घोंसला बनायेगी ?