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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verses 45–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 45,46

संस्कृत श्लोक

इति पर्याकुलस्यान्तः स खलु ध्यानवृत्तिषु । दरीष्वन्वहमुग्रासु वातमग्न इव द्रुमः ॥ ४५ ॥ अतिष्ठद्ध्यानसंरूढमननः संकटे यथा । दोलायितवपुस्तुच्छतृष्णातीरतरङ्गकैः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वायु द्वारा तटवर्ती जल में डूबाया गया और तट की लहरों से हिलाया जा रहा वृक्ष बड़े संकट में स्थित रहता है वैसे ही बड़ी-बड़ी गुफाओं में ध्यानमग्न मनवाले उद्दालक पूर्वोक्त रीति से ध्यानवृत्तियों मे व्याकुल मन के मध्य में तुच्छ तृष्णारूपी तीर तरगों से दोलायित शरीरवाले होकर बड़े संकट में स्थित रहे