Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
बाह्यानाभ्यन्तरान्स्पर्शांस्त्यक्त्वा निद्रां च तन्मनः ।
तमस्तेजोन्तिके लेभे कदाचिच्छाश्वतीं स्थितिम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
कभी उनका मन बाह्य स्पर्शो का (विषयों के
सम्बन्धों का) और आभ्यन्तर स्पर्शो का (समाधिसुख-सम्बन्धों का) त्यागकर तम (अज्ञान) और तेज
(आत्मज्योति) के अन तराल में (सन्धि में) लीन होकर निद्रारूपी शाश्वती (चिरकाल तक चलनेवाली)
स्थिति को प्राप्त होता था